इतनी गर्मी क्यों है? समझिए हीट वेव की स्थिति कैसे बन रही है

Heatwave तब कहते हैं जब दो या उससे ज्यादा दिन तक सामान्य से ज्यादा गर्मी रहती है.

धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसे में जिसे देखो वो इस भीषण गर्मी से परेशान है. गर्मी के सारे के सारे रिकॉर्ड टूटते चले जा रहे हैं. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है ?

इतनी गर्मी क्यों है? द क्लाइमेट चेंज डिक्शनरी- हीट वेव

'लेकिन मार्च में मई जैसी गर्मी क्यों लग रही है? मार्च में लू यानी हीट वेव? इतनी ज्यादा गर्मी है!' अगर आपने ये बातें नहीं कही या नहीं सुना तो शायद मार्च की इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पर मीम जरूर देखे होंगे.

लेकिन इतनी गर्मी है क्यों?

क्लाइमेट चेंज डिक्शनरी में हम इसी हीट वेव पर बात करेंगे.

मार्च में, जब पंखे स्लो स्पीड में चल रहे थे, जब कूलर अभी ठीक ही कराए जा रहे थे और जब पसीने पाउडर, रूहअफजा और रसना के विज्ञापन अभी आने शुरू ही हुए थे, देश के कई हिस्सों में लू या हीट वेव चलने लगी.

हीट वेव तब कहते हैं जब दो या उससे ज्यादा दिन तक सामान्य से ज्यादा गर्मी रहती है, जब एक इलाके में ऐतिहासिक औसत से ज्यादा तापमान हो.

और जब हम ऐतिहासिक औसत से ज्यादा तापमान कहते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है. ये गंभीर मसला है. इसका मतलब है इतना ज्यादा तापमान जो जान ले सकता है. और लोग मर रहे हैं. हर साल ये आंकड़ा बढ़ रहा है.

20 साल तक की गई एक स्टडी के मुताबिक दुनिया में हर साल 50 लाख से ज्यादा लोगों की मौत बढ़ते पारे के कारण हो रही है और आधे से ज्यादा मौतें एशिया में हो रही है.

भारत को विशेष चिंता की जरूरत है क्योंकि भारत ने पिछले डेढ़ दशक में अपने सबसे ज्यादा 15 गर्म सालों में से 12 देखे हैं

अभी तक हीट वेव के बजाय शीतलहर से ज्यादा ज्यादा मौतें हुई हैं लेकिन अब ये चीज बदल रही है.

बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है. ये जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज है.

हीट वेव एमएसीडी संकेतक क्या है और यह इतना विशेष क्यों है? के कारण हो रही मौतों में से एक तिहाई मौतें की वजह इंसानों के कारण दुनिया के बढ़ते तापमान से हो रही हैं. यानी इंसानों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन की वजह से.

इसका मतलब ये नहीं है कि शीतलहर नहीं होती है. शीत लहर की स्थिति भी गंभीर होती जा रही है और मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है.

इस भले इंसान की तरह अगर आप भी सोच रहे हैं कि अगर शीत लहर है तो धरती गर्म क्यों हो रही है.

ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण एमएसीडी संकेतक क्या है और यह इतना विशेष क्यों है? गर्मी भी बढ़ेगी और सर्दी भी. लेकिन आज हीट वेव पर ही बात करते हैं.

तो हीट वेव की स्थिति बनती कैसे है?

गर्म हवा हमेशा हीट वेव नहीं होती है. हीट वेव की स्थिति तब बनती है जब गर्म हवा फंस कर रह जाती है.

इसे समझने के लिए, आइए हम पांचवीं क्लास के साइंस के लेसन को याद करते हैं. एसी हमेशा कमरे की दीवार के सबसे ऊपर ही क्यों लगाए जाते हैं? क्योंकि गर्म हवा हल्की होती है और ऊपर जाती है, जैसे हॉट एयर बलून के साथ होता है और ठंडी हवा भारी होती है, इसलिए वह नीचे बैठ जाती है. इस प्रक्रिया से हवा प्रसारित होती जिससे गर्म हवा बाहर जाती है और ठंडी हवा अंदर रहती है.

कभी-कभी जब हवा हाई प्रेशर सिस्टम बनाती है, तो यह गर्म हवा जमीन से उठ नहीं पाती और नीचे ही फंस जाती है. हवा का इस तरह फंसना ही उसे हीटवेव बनाता है.

आमतौर पर जब गरमी होती है, तो गर्म हवा ऊपर उठती है, फिर बारिश होती है और गर्मी कम हो जाती है. लेकिन जब हवा ऊपर नहीं उठेगी तो बारिश नहीं होगी और फिर गर्मी हो जाएगी. काफी गर्मी.

भारत में जैसे-जैसे मौसम सर्दियों से गर्मियों में बदलते हैं, तो मार्च में थोड़ी गर्मी होना शुरू होती है, लेकिन यह केवल कुछ राज्यों में ही होता है. लेकिन इस साल ये कुछ राज्यों तक सीमित ना हो कर और ज्यादा राज्यों तक फैली. भौगोलिक रूप से अधिक भूभाग गर्म हो गया. ये गर्मी बढ़ने की वजह यानी हीटवेव बना.

और फिर अब उन कारणों से बारिश नहीं हुई जो मैंने अभी-अभी आपको बताईं. प्री मॉनसून बारिश नहीं हुई तो इसकी वजह से भी टेंप्रेचर और बढ़ गया जो पहले से बढ़ा हुआ था.

दुनिया भर में अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्र से लेकर अंटार्कटिका तक तापमान में बढ़ोतरी हुई है. ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, प्रदूषण, जंगल की कटाई सहित वो सभी भयानक चीजें जो हम कर रहे हैं उसकी वजह से धरती के तापमान में वृद्धि हुई है. ग्लोबल वार्मिंग ने इन विसंगतियों को जन्म दिया है. जलवायु परिवर्तन से इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं.

वैश्विक तापमान बढ़ने से जलवायु परिवर्तन और बदतर होता जा रहा है

वर्तमान में, हम पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.1 डिग्री सेल्सियस ऊपर हैं. इसने हमें पहले ही उस मुकाम तक पहुंचा दिया है जहां हम अभी हैं. यदि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो पृथ्वी की 14% आबादी हर पांच साल में कम से कम एक बार भीषण गर्मी की चपेट में आएगी.

अगर वैश्विक तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो हर 5 साल में कम से कम एक बार 1.7 अरब अतिरिक्त लोग भीषण गर्मी की चपेट में आएंगे.

और अगर 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, तो सालाना वैश्विक हीटवेव 5 प्रतिशत से बढ़कर 80 प्रतिशत होने का चांस है. आशा करते हैं कि ऐसा न हो.

विश्व के देश लंबे समय से बढ़ते तापमान को सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं. मौजूदा लक्ष्य इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस एमएसीडी संकेतक क्या है और यह इतना विशेष क्यों है? पर रोकना है. यह समझने के लिए कि हम इस तापमान वृद्धि को रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, इसमें भारत की क्या भूमिका है और हमारा भविष्य कितना उज्ज्वल या अंधकारमय दिखता है. हमारे पिछले वीडियो देखें.

उपदेश का वक्त खत्म, चाहे ये आपको दूर की मुसीबत नजर आती हो लेकिन इसका असर आप पर भी पड़ रहा है. आपका बिजली का बिल अब पहले की तरह नहीं रहेगा, लिहाजा उसके लिए एक रिमाइंडर, ये आपके फैशन, आपकी छुट्टियों और अगर आप इस्तेमाल करते हैं तो आप घमौरियों का कौन सा पाउडर यूज करते हैं, ये सब बदलने वाला है.

(The Climate change dictionary से आपको हम क्लाईमेट चेंज पर ग्लोबल पॉलिटिक्स के बारे में आसान शब्दों में बताने की कोशिश करते हैं, तो देखना न भूलें.)

Bihar Politics: बिहार में मोदी को मात देंगे नीतीश कुमार? मंगलवार को बुलाई पार्टी की अहम बैठक

Bihar Politics: बिहार में मोदी को मात देंगे नीतीश कुमार? मंगलवार को बुलाई पार्टी की अहम बैठक

Bihar Politics: बिहार में एनडीए गठबंधन में दरार आ गई है। राजनीतिक गलियारों में इसकी जोर-शोर से चर्चा है कि नीतीश कुमार बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर सकते हैं। कयास लगाये जा रहे हैं कि नीतीश कुमार फिर एक बार आरजेडी के साथ गठबंधन कर सरकार बना सकते हैं। सीएम नीतीश कुमार के मंगलवार को पार्टी के नेताओं एमएसीडी संकेतक क्या है और यह इतना विशेष क्यों है? की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। इससे इन आशंकाओं को और ज्यादा बल मिल गया है।

बीजेपी की क्या है प्रतिक्रिया?

जदयू के रुख को लेकर बीजेपी ने अभी कोई टिप्पणी नहीं की है। बीजेपी के करीबी सूत्रों के मुताबिक पार्टी फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में है और अपनी तरफ से नीतीश कुमार की पार्टी को तोड़ने या सरकार गिराने का कोई प्रयास नहीं करेगी। इस बीच दोपहर के वक्त रविशंकर प्रसाद, शाहनवाज हुसैन, नितिन नवीन, नित्यानंद राय आदि बड़े नेता दिल्ली रवाना हो गये। इससे साफ संकेत मिलता है कि मामला गंभीर है। वहीं गहमा-गहमी भरे माहौल के बीच पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल, उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद सहित भाजपा के तमाम बड़े नेता अपने रूटीन कार्यक्रम में जुटे रहे।

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संभव है आरजेडी-जेडीयू का गठबंधन?

नये गठबंधन की संभावनाओं पर आरजेडी ने अपना स्टैंड साफ करते हुए कहा है कि अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बीजेपी से संबंध तोड़ते हैं तो आरजेडी उन्हें और उनकी पार्टी को गले लगाने को तैयार है। लेकिन मामला इतना आसान भी नहीं है। सबसे पहले तो इस बात पर विवाद है कि नई पारी की शुरुआत करने पर बिहार का सीएम कौन होगा। जानकारों के मुताबिक आरजेडी फिर से नीतीश कुमार पर भरोसा करने की गलती नहीं करना चाहती। उधर, जेडीयू को नीतीश कुमार के अलावा दूसरा कोई और नाम मंजूर नहीं है। इसी तरह बिहार विधानसभाध्यक्ष की कुर्सी को लेकर दोनों पक्षों में विवाद बना हुआ है।

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क्यों आई बीजेपी-जेडीयू गठबंधन में दरार?

बीते दिन जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह के इस्तीफा देने के बाद बिहार राजनीति में हलचल मच गई थी। एक थ्योरी ये है कि नीतीश कुमार इस मामले को बीजेपी की सरकार गिराने की साजिश से जोड़ रहे हैं। उन्हें आशंका है कि बीजेपी बिहार में एमएसीडी संकेतक क्या है और यह इतना विशेष क्यों है? भी 'महाराष्ट्र' जैसा खेल करने की प्लानिंग में है। ऐसे में वह पहले ही नया गठबंधन बनाकर अपनी सत्ता सुरक्षित करना चाहते हैं। वहीं दूसरी थ्योरी के मुताबिक नीतीश कुमार उपराष्ट्रपति बनना चाहते थे। लेकिन बीजेपी ने उन्हें भाव नहीं दिया और इस वजह से वो नाराज चल रहे हैं और गठबंधन तोड़ने पर उतारू हैं।

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इन सबके बीच असली कारण क्या ये बताना मुश्किल है, लेकिन सत्ता के खेल में नीतीश कुमार भी किसी से कम नहीं है। बिहार की राजनीति में उनकी सूझबूझ और जोड़-तोड़ कर सत्ता में बने रहने की कला उन्हें बखूबी आती है। ऐसे में बिहार की राजनीति किस करवट बैठती है, इसका फैसला कल की बैठक के बाद सामने आ सकता है।

नेताजी की मौत का रहस्य: सरकार के अधीन CFSL ने गुमनामी बाबा के DNA सैंपल पर रिपोर्ट देने से किया इनकार, RTI से खुलासा

Netaji death mystery: केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL), जो गृह मंत्रालय के अधीन है. उसने ने गुमनामी बाबा के डीएनए नमूने की इलेक्ट्रोफेरोग्राम रिपोर्ट का विवरण साझा करने से इनकार कर दिया है, जो कुछ लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस मानते हैं. सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(ए),(ई) और 11(1) का हवाला देते हुए. नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर शोध कर रहे हुगली के कोन्नगर निवासी सयाक सेन ने आरटीआई दायर की थी. आरटीआई इस साल 24 सितंबर को दायर की गई थी.

आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1) में कहा गया है कि जिसके प्रकटीकरण से संप्रभुता और अखंडता या भारत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. राज्य की सुरक्षा, रणनीतिक, आर्थिक हित. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, सयाक सेन ने कहा कि सीएफएसएल ने उनकी आरटीआई को खारिज कर दिया, यह जवाब देते हुए कि वह तीन कारणों के आधार पर इलेक्ट्रोफेरोग्राम रिपोर्ट साझा नहीं करेगा.

एक इलेक्ट्रोफेरोग्राम वैद्युतकणसंचलन स्वचालित अनुक्रमण द्वारा किए गए विश्लेषण से परिणामों की एक साजिश है. एक इलेक्ट्रोफेरोग्राम डेटा का एक क्रम प्रदान करता है जो एक स्वचालित डीएनए अनुक्रमण मशीन द्वारा निर्मित होता है. वंशावली डीएनए परीक्षण और पितृत्व परीक्षण से परिणाम प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रोफेरोग्राम का उपयोग किया जा सकता है.

सेन ने कहा, “मुझे आधिकारिक तौर पर बताया गया है कि इलेक्ट्रोफेरोग्राम 3 कारणों से नहीं दिया जा सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे सार्वजनिक करना भारत की संप्रभुता और विदेशी राज्यों के साथ उसके संबंधों को प्रभावित कर सकता है.” सेन ने अपने आरटीआई में यह भी पूछा कि उत्तर प्रदेश के सुदूर इलाके में रहने वाला एक व्यक्ति भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए इतना मायने क्यों रखता है और अगर उसका इलेक्ट्रोफेरोग्राम सार्वजनिक किया जाता है तो देश में हलचल मच जाएगी.

सेन ने आगे बताया, “स्पष्ट संकेत है कि गुमनामी बाबा एक आम आदमी से कहीं अधिक थे, और विशेष थे. मेरा मानना ​​है कि वह मेरे सभी निष्कर्षों के अनुसार भेष में नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे.” यह दावा किया गया है कि बोस की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हुई थी. हालांकि, लोगों के एक वर्ग का दावा है कि वह दुर्घटना में बच गया और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से बचने के लिए छिप गया.

MCD Election Result 2022 : दिल्ली में केजरीवाल का जलवा बरकरार, 15 साल बाद एमसीडी से भाजपा बेदखल

जनहित और भागदारी के दम पर दिल्ली में केजरीवाल का जलवा बरकरार, भाजपा एमसीडी से बेदखल

MCD Election Result 2022 : जो काम तीन बार मुख्यमंत्री चुने जाने के बावजूद शीला दीक्षित नहीं कर पाईं उस काम को आठ साल में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने कर दिखाया। परिणाम यह निकला कि एमसीडी की सत्ता पर 15 साल से काबिज भाजपा उससे बेदखल हो गई।

एमसीडी चुनाव रुझानों पर धीरेंद्र मिश्र का विश्लेषण

MCD Election Result 2022 : दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम तेजी से आने का सिलसिला जारी है। ताजा रुझानों के मुताबिक अरविंद केजरीवाल ( Arvind Kejriwal ) की पार्टी आप ( AAP ) का एमसीडी ( MCD ) में मेयर होगा। अभी तक के रुझानों में आप 250 में से 132 सीटों पर आगे है। जबकि भाजपा ( BJP ) 104 सीटों पर आगे है। 11 सीटों पर कांग्रेस ( Congress ) के उम्मीदवार आगे चल रहे हैं। यानि 15 साल बाद एमसीडी की सत्ता पर भी आप काबिज हो गई है। कहने का मतलब यह है कि दिल्ली में अब मिनी सरकार भी आप की। केंद्र के पास केवल डीडीए और दिल्ली पुलिस रह गई है।

साफ है कि आप ने दिल्ली ( Delhi ) में कांग्रेस की जगह मजबूती के साथ ले ली है। केजरीवाल की पार्टी को गरीबों, मजदूरों और प्रवासियों की राजनीति में ख्याल रखने और सियासी जनभागीदारी देने का लाभ मिलने का सिलसिला अब दिल्ली विधानसभा के बाद एमसीडी में मिलने लगा है। यह इस बात के भी संकेत हैं कि केजरीवाल को लेकर आम मतदाताओं में क्रेज आज भी कायम है।

फिलहाल 126 सीटों पर चुनाव परिणाम आ गए हैं। 93 पर आप आगे हैं। 73 पर भाजपा आगे है। छह पर कांग्रेस और 3 पर अन्य आगे हैं। ताजा रुझानों से भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि उसकी शर्मनाक हार न होकर सम्मानजनक हार होगी। एमसीडी चुनाव परिणाम के मुताबिक सबसे अहम बात यह है जिस भाजपा को एमसीडी को 2012 में तीन निगमों में बांटने के बाद भी पूर्व सीएम शीला दीक्षित भाजपा को सत्त से बाहर नहीं कर पाईं, उसे एमसीडी हेडक्वार्टर यानि सिविक सेंटर से बाहर करने काम केजरीवाल ने कर दिया है।

इतना ही नहीं, ताजा एमसीडी चुनाव परिणामों से साफ है कि अब आप देश की राजधानी दिल्ली में केवल जाटों, बनियों और पंजाबियों व अभिजातों के दम पर राजनीति नहीं कर सकते। भाजपा की राजनीति इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा ने कुछ हद तक खुद को प्रवासियों से जोड़ने का काम किया था, लेकिन दोनों के बाद भाजपा ने कभी भी प्रवासियों का दिल्ली में सियासी भागीदारी दिल से देने काम नहीं किया। लाल बिहारी तिवारी, मनोज तिवारी व एक दौर में कीर्ति झा आजाद जैसे चेहरों को केवल दिखावे के लिए सामने लाया गया। भाजपा को अपनी इस रणनीति पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है।

ऐसा करना भाजपा के लिए जरूरी है, क्योंकि करीब ढ़ाई दशक से भाजपा दिल्ली विधानसभा में बहुमत हासिल नहीं पाई, लेकिन गरीबों, अल्पसंख्यकों और निम्न आय वर्ग की राजनीति कर केजरीवाल लगातार दिल्ली विधानसभा का चुनाव तीन बार जीत चुके हैं। केजरीवाल और उनकी टीम ने अन्ना आंदोलन के बाद कांग्रेस को रिप्लेस करने का काम किया है। वह शीला दीक्षित की मुहिम को आगे बढ़ा रहे है।

शीला दीक्षित ने दिल्ली की 1700 से ज्याद कॉलोनियों में रहने वाले 60 लाख से ज्यादा लोगों को गली, नालियों, सड़कों और बिजली मुहैया कराने का काम किया। केजरीवाल उसी को आगे बढ़ाते हुए मोहल्ला क्लिनिक, स्कूली शिक्षा और बिजली, पानी के बिलों में छूट देकर बड़ी राहत दी है। लोगों को लगने लगा है कि दिल्ली में अमीरी के अलावा गरीबों की सुनने वाला भी कोई है।

हालांकि, कुछ मोर्चों पर केजरीवाल कमजोर भी साबित हुए हैं, लेकिन लोकतंत्र में वोट की अपनी अहमियत होती है। उन्होंने इस बात पर गौर फरमाया कि उन्हें वोट कहां से वोट चाहिए और वहां पर क्या करने की जरूरत है। केजरीवाल की इसी सामान्य सी दिखनी वाली सियासी समझ ने उनका मजाक उड़ाने वालों का दिल्ली में एक बार फिर मुंह बंद कर दिया है। इसका सीधा लाभ आप को यह मिला है कि अब एमसीडी में आप काबिज हो गई। एमसीडी चुनाव में जीत के बाद अब केजरीवाल की जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब वो यह नहीं कह पाएंगे कि एमसीडी हमारे पास नहीं है इसलिए दिल्ली साफ नहीं है। यमुना की सफाई नहीं हो पा रही। प्राइमरी शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति खराब है। केजरीवाल और उनकी टीम को दिल्ली काम कर दिखाना होगा।

दूसरी तरफ एमसीडी के रुझानों से दिल्ली में भाजपा के लिए खतरे की घंटी बज गई है। आप यह सवाल पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों, इसका जवाब ये है कि 15 माह बाद ​लोकसभा का चुनाव है दो साल बाद विधानसभा का चुनाव दिल्ली में होने है। दिल्ली में सात के सात लोकसभा सांसद भाजपा के हैं। केजरीवाल लोकसभा चुनाव में आप सांसद को अभी तक जितवा नहीं पाये हैं। अब वो चाहेंगे कि विधानसभा और एमसीडी के बाद लोकसभा सांसद भी आम आदमी पार्टी का नेता ही बने। यानि अब खतरा सीधे मोदी और शाह के अस्तित्व पर है।

भाजपा के लिए राहत की बात केवल यह है कि वो आठ राज्यों के सीएम और 17 केंद्रीय मंत्रियों को सियासी मैदान के उतरने के बावजूद भाजपा को एमसीडी में वापसी नहीं करा पाई। हां, इसका लाभ यह जरूर मिला कि करारी शिकस्त से भाजपा बच गई। भाजपा ने एक चतुराई ये दिखाई कि एमसीडी चुनाव में पीएम मोदी और अमित शाह को इस बार मैदान में नहीं उतारा। यानि लोकसभा चुनाव में भाजपा शीर्ष नेतृत्व को अभी धक्का नहीं लगा है। भाजपा लोकसभा चुनाव में इसका लाभ उठाने की स्थिति में होगी।

MCD Election Result 2022 : कुल मिलाकर आप यह कह सकते है। कि जनभागदारी के दम पर दिल्ली में आप की लहर हैै और भाजपा सत्ता से पूरी तरह से बेदखल हो गई है। भाजपा नेतृत्व को नये सिरे से सोचने की जरूरत। भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो मोदी-शाह की राजनीति में राहु-केतु की तरह केजरीवाल और उनकी टीम ग्रहण लगाने का काम आगे भी जारी रखेंगे।

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